JANSANGH

                              ।। राष्ट्रदेवो भव।।

                      21 अक्टूबर 1951 को नई दिल्ली में महान् बलिदानी डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता तथा पंडित मौलीचन्द्र शर्मा, वैध गुरूदत्त, लाला योधरज, प्रो0 बलराज मधोक आदि देशभक्तों की सहभागिता में स्थापित भारतीय जनसंघ स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रवादी-यथार्थवादी राजनीतिक दल हैं जिसने संसद के अन्दर और बाहर नेहरूवाद का विकल्प और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संखनाद किया। भारत में अभारतीय शासन के विकल्प के रूप में भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक नीतियों की आधुनिक सन्दर्भों में व्याख्या और अनुप्रयोग के आग्रही एवं देश की एकता-अखण्डता के विश्वनीय वाहक के रूप में जनसंघ का उदय हुआ था। डॉ. मुखर्जी ने आधे बंगाल और आधे पंजाब को पाकिस्तान जाने से बचाया था। जम्मू और कश्मीर से दो विधान-दो निशान और दो प्रधान समेत कई देशविरोधी विकृतियों को हटाने के लिए उन्होंने अत्मोत्सर्ग कर दिया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने महामंत्री और प्रो. बलराज मधोक ने मंत्री के रूप में संगठन एवं विचार-पगचार का सघन अभियान चलाकर जनसंघ को इसकी उत्कृष्ट विचारधारा व चरित्र-चिंतन के आधार पर भारत का प्रमुख दल और विश्वविश्रत संगठन बना दिया था। यूरोपीय देशों के तत्कालिन C.D.P. (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी) के नेताओं ने जनसंघ को भारत का H.D.P. (हिन्दू डेमोक्रेटिक पार्टी) मान लिया था और इसके नेताओं प्रो0 मधोक जनसंघ के 9 वें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें तथा 1967 के आमचुनावों में स्वतंत्र पार्टी और कुछ स्वतंत्र उम्मीदवारों से तालमेल कर लोकसभा में 100 के लगभग सांसद निर्वाचित हुए थे। अकेले जनसंघ के 35 सांसद थे और कई राज्यों की विधानसभाओं में यह पहली या दूसरी पार्टी बन गया था। दिसंबर 1967 में कालीकट अधिवेशंन में एकात्म मानववाद के प्रणेता महामनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय अध्यक्ष बने किन्तु 11 फरवरी 1968 को उनका शव मुगलसराय यार्ड में मिला। डॉ. मुखर्जी की श्रीनगर जेल में हत्या, आचार्य डॉ. रघुवीर की सड़क दुर्घटना में और पंडित उपाध्याय की रहस्यमयी हत्याओं ने जनसंघ और इसकी प्रगति पर गहरा आघात पहुंचाया। इन हत्याओं पर रहस्य का पर्दा उठना अभी बाकी हैं। 1973 में जनसंघ में वर्चस्व प्राप्त लोगों ने प्रो0 बलराज मधोक जो संस्थापक सचिव डॉ. मुखर्जी के अभिन्त और विश्वास भजन, पार्टी के प्रथम घोषणा में सारे विपक्षी नेता जेलों में बंद कर दिए गए। जेल के अंदर ही नेताओं की आपसी तालमेल से ’’जनतापार्टी’’ का नाम और चौधरी चरण सिंह के ’’भारतीय लोकदल’’ का चक्र हलधर चुनावचिन्ह अपनाने का निर्णय हुआ। ज्ञातव्य हैं कि 1977 में जनतापार्टी की सरकार पहले बन गयी थी, संगठन बाद में बना। इसके पहले कोई दलों की औपचारिक विलय आदि का कार्य कुछ भी नहीं हुआ था।

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1977 में प्रो. मधोक संसद या सरकार में कहीं नहीं थे। उन्होंने अपनी विचारधारा या सिद्धान्तों से समझौता कभी नहीं किया था। जब श्रीमोरारजी देसाई नीत जनतापार्टी सरकार तुष्टीकारण में कांग्रेंस से भी आगे निकलने लगी। तथा प्रो. मधोक के बार-बार चेताने पर भी देशहित से दूर जाने लगी, अल्पसंख्यक आयोग आदि का गठन हुआ तब 4 जनवरी 1979 में प्रो. बलराज मधोक ने भारतीय जनसंघ के संस्थापना काल से लेकर अब तक के देशभक्ति साथियों और कार्यकत्ताओें का सम्मेलन किया। भारतीय जनसंघ के ही संविधान, चुनावचिन्ह, विचारधारा आदर्शों एवं नीतियों को ज्यों-की त्यों अपनाकर अखिल भारतीय जनसंघ नाम से पुनः स्थापना और निबंधन कराया गया। प्रो. मधोक अध्यक्ष बने। 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनतापार्टी आस्तित्व में आयी। उसके मंच पर गांधी जी, और जेपी और डॉ. अम्बेडकर के चित्र थे। श्री वाजपेयी और आडवाणी ने अपने भाषणों में अपने को जनसंघ से भिन्न और असली जनतापार्टी बताया था। प्रो. मधोक की सरलता और विश्वास करने की प्रवृत्ति तथा संसाधनों के घोर अमान के कारण जनसंघ को उचित सफलता दोबारा नहीं मिल सकी। इस समय आचार्य भारतभूषण ने अथक परिश्रम और व्यूहरचनापूर्वक इसे सीमित क्षेत्रों में मजबूत कर राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता तथा डॉ. मुखर्जी-दीनदयालजी, स्वामी विवेकानन्द-दयानन्द, डॉ. हेडगेवार-गुरूजीगोलवलकर जी और आचार्य चाणक्य-स्वामी करपात्रीजी के आदर्शों के भारत का निर्माण में लगे हुए हैं।

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